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झूठे विवाह वादे पर बने संबंधों के मामलों में आरोपी की नीयत देखना जरूरी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में यह स्पष्ट किया है कि शादी का वादा करने के बाद आपसी सहमति से बने यौन संबंध, और शुरुआत से ही बुरी नीयत से झूठा वादा करके बनाए गए यौन संबंध — दोनों में फर्क है। कोर्ट ने कहा, “बलात्कार और सहमति से बने यौन संबंधों में स्पष्ट अंतर है। जब मामला शादी के वादे का हो, तो अदालत को यह बहुत सावधानी से देखना होगा कि आरोपी सच में पीड़िता से शादी करना चाहता था या फिर उसकी नीयत शुरू से ही गलत थी और उसने केवल अपनी वासना की पूर्ति के लिए झूठा वादा किया था। बाद वाली स्थिति धोखाधड़ी या छल के दायरे में आती है।”

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने विवाह के झूठे बहाने पर बलात्कार के मामले में मजिस्ट्रेट द्वारा आरोपी को भेजे गए समन को रद्द कर दिया। कोर्ट ने पाया कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि आरोपी की नीयत शुरू से ही गलत थी। शिकायत में यह सामने आया था कि दोनों का रिश्ता कई वर्षों (2010–2014) तक चला, पीड़िता के परिवार से भी मुलाकात हुई और शादी को लेकर पुलिस की मौजूदगी में आश्वासन भी दिए गए। कोर्ट ने कहा कि ये परिस्थितियाँ यह दर्शाती हैं कि यह एक वास्तविक रिश्ता था जो बाद में टूट गया, न कि शुरू से ही शादी का झूठा वादा कर यौन संबंध बनाए गए। कोर्ट ने यह भी जोर दिया कि वादा तोड़ना और झूठा वादा करना दोनों अलग-अलग बातें हैं। टूटी हुई सगाई को नागरिक या नैतिक गलती माना जा सकता है, लेकिन इसे बलात्कार का अपराध तभी कहा जा सकता है जब शुरुआत से ही धोखे की नीयत साबित हो। Source From Live Law.

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