
ढाका/नई दिल्ली।
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ मानवता के विरुद्ध अपराधों के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने दे दी है। मौजूदा अंतरिम सरकार की अपील पर यह निर्णय लिया गया है, जिसमें शेख हसीना, पूर्व गृह मंत्री और पूर्व पुलिस प्रमुख को 16 जून को अदालत में पेश होने का निर्देश दिया गया है।
क्या है यह न्यायाधिकरण?
बांग्लादेश में यह न्यायाधिकरण विशेष रूप से युद्ध अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए गठित किया गया था। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान हुए अपराधों की जांच और आरोपियों पर कार्रवाई के उद्देश्य से 1973 में “इंटरनेशनल क्राइम्स (ट्राइब्यूनल) एक्ट” पारित किया गया।
हालांकि 1974 में पाकिस्तान द्वारा बांग्लादेश को मान्यता दिए जाने के बाद, 195 युद्ध अपराध के आरोपियों को छोड़ दिया गया और कानून निष्क्रिय हो गया। तीन दशकों तक यह कानून केवल कागज़ों में रहा।
2009 में शेख हसीना के सत्ता में आने के बाद इस कानून को फिर से जीवित किया गया और संशोधित किया गया। संशोधन के बाद इसका दायरा केवल सैन्यकर्मियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम नागरिकों, राजनीतिक नेताओं और अधिकारियों तक भी बढ़ा दिया गया। इसके तहत तीन सदस्यीय ट्राइब्यूनल गठित किया गया, जिसे अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण कहा गया।
शेख हसीना पर कौन-कौन से आरोप हैं?
2024 में बांग्लादेश में हुए छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना पर गंभीर आरोप लगे। आरक्षण नीति से जुड़ा एक अदालती फैसला सामने आने के बाद देशभर के छात्र सड़कों पर उतर आए। यह आंदोलन धीरे-धीरे हिंसक हो गया, और इसे शेख हसीना सरकार की दमनकारी कार्रवाई के लिए जिम्मेदार ठहराया गया।
हिंसा में करीब 400 से अधिक लोगों की जान चली गई। पुलिस और सरकारी एजेंसियों पर प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाने और अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगे। उसी दौरान शेख हसीना ने आंदोलनकारियों को लेकर कथित भड़काऊ भाषण दिए, जिसके बाद आंदोलन और उग्र हो गया। इस घटना के बाद शेख हसीना बांग्लादेश छोड़कर भारत आ गईं।
शेख हसीना पर न्यायाधिकरण में पांच प्रमुख आरोप लगाए गए हैं:
- मानवता के विरुद्ध अपराधों में संलिप्तता:
हजारों प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध हिंसा भड़काने और उस पर नियंत्रण करने में असफल रहने का आरोप। - हत्या और हत्या के प्रयास का आरोप:
ढाका और अशुलिया में निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलवाने का आरोप। - भड़काऊ भाषण देना:
आंदोलन के दौरान हिंसा को बढ़ावा देने वाले भाषण देने का आरोप। - घातक हथियारों के इस्तेमाल की अनुमति देना:
सुरक्षा बलों को प्रदर्शन दबाने के लिए अत्यधिक बल और हथियारों के इस्तेमाल की इजाजत देने का आरोप। - न्यायिक प्रक्रिया में बाधा:
प्रदर्शनकारी छात्र अबु सैयद की हत्या और उसके बाद जांच को प्रभावित करने का आरोप।
क्या शेख हसीना का प्रत्यर्पण संभव है?
शेख हसीना वर्तमान में भारत में शरण लिए हुए हैं। उनके प्रत्यर्पण की प्रक्रिया कानूनी और राजनयिक दोनों स्तरों पर चुनौतीपूर्ण है। भारत और बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण संधि जरूर है, लेकिन उसमें राजनीतिक शरणार्थियों को लेकर जटिलताएं हैं।

अगर भारत यह मानता है कि शेख हसीना को बांग्लादेश में निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिलेगी या उनके जीवन को खतरा है, तो प्रत्यर्पण प्रक्रिया में बाधा आ सकती है। इसके अलावा शेख हसीना का भारत में शरण लेना भारत-बांग्लादेश संबंधों में नया मोड़ ला सकता है।
क्या यह मामला राजनीतिक है?
विश्लेषकों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण का पुनः सक्रिय होना और उसमें शेख हसीना पर मुकदमा चलना बांग्लादेश की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों से जुड़ा है। आलोचकों का आरोप है कि इस ट्राइब्यूनल का उपयोग पहले भी शेख हसीना ने अपने राजनीतिक विरोधियों को निपटाने के लिए किया था, और अब वही हथियार उनके खिलाफ इस्तेमाल हो रहा है।
अंतरिम सरकार द्वारा यह कदम उठाना यह संकेत देता है कि देश में सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक बदले की भावना प्रबल हो सकती है। हालांकि, सरकार का कहना है कि यह फैसला पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया के तहत लिया गया है और इसमें किसी भी प्रकार की पक्षपात की गुंजाइश नहीं है।
क्या हो सकती है आगे की रणनीति?
शेख हसीना की कानूनी टीम भारत में शरण की वैधता को कायम रखने और प्रत्यर्पण से बचने की दिशा में काम कर रही है। वहीं, बांग्लादेश की अंतरिम सरकार इंटरपोल के माध्यम से रेड कॉर्नर नोटिस जारी करने पर भी विचार कर रही है, ताकि शेख हसीना की गिरफ्तारी सुनिश्चित की जा सके।
यदि शेख हसीना कोर्ट में पेश नहीं होतीं, तो उन्हें फरार अपराधी घोषित किया जा सकता है और उनके खिलाफ मुकदमा अनुपस्थिति में भी चलाया जा सकता है।
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